हवा के झोंके ये खुला मैदान प्रातः काल की बेला सुहाना मौषम और उनकी यादें न जाने ये कैसी ख्वाइश है जागी की यू ही निहारता रहूँ बस निहारता रहूँ उन्हें.....
न जाने क्यों । Shayari and love 1 न जाने क्यों तुम दूर हो फिर भी पास लगते हो , जब भी तुम्हे तलाशता हूँ दुनियाँ के कोने में अक्सर दिल के पास दिखते हो । न जाने क्यों तुम दूर होकर भी पास लगते हो । 【 नवनीत सूर्यवंशी 】
दोस्ती वो दोस्ती ही कैसी जो लफ्जो की राह तके , वो मोहब्बत ही कैसा जो दिल की न बात समझे, करके सितम बेशुमार खुद पर मुझे वो बहलाती है, नफरत दिखा कर मेरी वो परवाह करती है ..।
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